श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.10.22

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

कुरु त्वं प्रेतकार्याणि पितुः पूतस्य सर्वशः।

मदङ्गस्पर्शनेनाङ्ग लोकान्यास्यति सुप्रजाः॥ २२

kuru tvaṃ pretakāryāṇi pituḥ pūtasya sarvaśaḥ|

madaṅgasparśanenāṅga lokānyāsyati suprajāḥ|| 22

अर्थ

यद्यपि मेरे अंगोंका स्पर्श होनेसे तुम्हारे पिता पूर्णरूपसे पवित्र हो गये हैं, तथापि तुम उनकी अन्त्येष्टि-क्रिया करो। तुम्हारे-जैसी सन्तानके कारण उन्हें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होगी॥ २२॥✎ 626 2024

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #626 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीनृसिंहभगवान् ने → श्रीनृसिंहभगवान्‌ने
  • #2024 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें