जिस प्रकार भगवान्के प्यारे भक्त अपनी भेद-भावरहित अनन्य भक्तिके द्वारा भगवत्स्वरूपको प्राप्त कर लेते हैं, वैसे ही शिशुपाल आदि नरपति भी भगवान्के वैरभावजनित अनन्य चिन्तनसे भगवान्के सारूप्यको प्राप्त हो गये॥ ४०॥
यथा यथा भगवतो भक्त्या परमयाभिदा।
नृपाश्चैद्यादयः सात्म्यं हरेस्तच्चिन्तया ययुः॥ ४०
जिस प्रकार भगवान्के प्यारे भक्त अपनी भेद-भावरहित अनन्य भक्तिके द्वारा भगवत्स्वरूपको प्राप्त कर लेते हैं, वैसे ही शिशुपाल आदि नरपति भी भगवान्के वैरभावजनित अनन्य चिन्तनसे भगवान्के सारूप्यको प्राप्त हो गये॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.10.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 871) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/10/40/