श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.10.46

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

य एतत् पुण्यमाख्यानं विष्णोर्वीर्योपबृंहितम्।

कीर्तयेच्छ्रद्धया श्रुत्वा कर्मपाशैर्विमुच्यते॥ ४६

ya etat puṇyamākhyānaṃ viṣṇorvīryopabṛṃhitam|

kīrtayecchraddhayā śrutvā karmapāśairvimucyate|| 46

अर्थ

भगवान्‌के पराक्रमसे पूर्ण इस पवित्र आख्यानको जो कोई पुरुष श्रद्धासे कीर्तन करता और सुनता है, वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ४६॥✎ 632

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #632 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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