श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.12.27

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

मृत्यौ पायुं विसर्गं च यथास्थानं विनिर्दिशेत्।

दिक्षु श्रोत्रं सनादेन स्पर्शमध्यात्मनि१ त्वचम्॥ २७

mṛtyau pāyuṃ visargaṃ ca yathāsthānaṃ vinirdiśet|

dikṣu śrotraṃ sanādena sparśamadhyātmani tvacam|| 27

अर्थ

इसी प्रकार वाणी और उसके कर्म भाषणको उसके अधिष्ठातृदेवता अग्‍निमें, हाथ और उसके द्वारा होनेवाले कला-कौशलको इन्द्रमें, चरण और उसकी गतिको कालस्वरूप विष्णुमें, रति और उपस्थको प्रजापतिमें एवं पायु और मलोत्सर्गको उनके आश्रयके अनुसार मृत्युमें लीन कर दे। श्रोत्र और उसके द्वारा सुने जानेवाले शब्दको दिशाओंमें, स्पर्श और त्वचाको वायुमें, नेत्रसहित रूपको ज्योतिमें, मधुर आदि रसके सहित* रसनेन्द्रियको जलमें और युधिष्ठिर! घ्राणेन्द्रिय एवं उसके द्वारा सूँघे जानेवाले गन्धको पृथ्वीमें लीन कर दे॥ २६—२८॥✎ 1365

यह अर्थ श्लोक 26–28 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा० स्पर्शेनाध्यात्मचिन्तनम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 882)
  2. *

    यहाँ मूलमें ‘प्रचेतसा’ पद है, जिसका अर्थ ‘वरुणके सहित’ होता है। वरुण रसनेन्द्रियके अधिष्ठाता हैं। श्रीधर-स्वामीने भी इसी मतको स्वीकार किया है। परन्तु इस प्रसंगमें सर्वत्र इन्द्रिय और उसके विषयका अधिष्ठातृदेवमें लय करना बताया गया है, फिर रसनेन्द्रियके लिये ही नया क्रम युक्तियुक्त नहीं जँचता। इसलिये यहाँ श्रीविश्‍वनाथ चक्रवर्तीके मतानुसार ‘प्रचेतसा’ पदका (‘प्रकृष्टं चेतो यत्र स प्रचेतो मधुरादिरसस्तेन’—जिसकी ओर चित्त अधिक आकृष्ट हो, वह मधुरादि रस ‘प्रचेतस्’ है, उसके सहित) इस विग्रहके अनुसार प्रस्तुत अर्थ किया गया है और यही युक्तियुक्त मालूम होता है।

    (मुद्रित पृष्ठ 882)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1365 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): २६—२८ → २६—२८॥

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