॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.12.28
रूपाणि चक्षुषा राजन् ज्योतिष्यभिनिवेशयेत्२।
अप्सु प्रचेतसा जिह्वां घ्रेयैर्घ्राणं क्षितौ न्यसेत्॥ २८
rūpāṇi cakṣuṣā rājan jyotiṣyabhiniveśayet|
apsu pracetasā jihvāṃ ghreyairghrāṇaṃ kṣitau nyaset|| 28
अर्थ
इसी प्रकार वाणी और उसके कर्म भाषणको उसके अधिष्ठातृदेवता अग्निमें, हाथ और उसके द्वारा होनेवाले कला-कौशलको इन्द्रमें, चरण और उसकी गतिको कालस्वरूप विष्णुमें, रति और उपस्थको प्रजापतिमें एवं पायु और मलोत्सर्गको उनके आश्रयके अनुसार मृत्युमें लीन कर दे। श्रोत्र और उसके द्वारा सुने जानेवाले शब्दको दिशाओंमें, स्पर्श और त्वचाको वायुमें, नेत्रसहित रूपको ज्योतिमें, मधुर आदि रसके सहित* रसनेन्द्रियको जलमें और युधिष्ठिर! घ्राणेन्द्रिय एवं उसके द्वारा सूँघे जानेवाले गन्धको पृथ्वीमें लीन कर दे॥ २६—२८॥✎ 1365
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—ज्योतिःष्व०।
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यहाँ मूलमें ‘प्रचेतसा’ पद है, जिसका अर्थ ‘वरुणके सहित’ होता है। वरुण रसनेन्द्रियके अधिष्ठाता हैं। श्रीधर-स्वामीने भी इसी मतको स्वीकार किया है। परन्तु इस प्रसंगमें सर्वत्र इन्द्रिय और उसके विषयका अधिष्ठातृदेवमें लय करना बताया गया है, फिर रसनेन्द्रियके लिये ही नया क्रम युक्तियुक्त नहीं जँचता। इसलिये यहाँ श्रीविश्वनाथ चक्रवर्तीके मतानुसार ‘प्रचेतसा’ पदका (‘प्रकृष्टं चेतो यत्र स प्रचेतो मधुरादिरसस्तेन’—जिसकी ओर चित्त अधिक आकृष्ट हो, वह मधुरादि रस ‘प्रचेतस्’ है, उसके सहित) इस विग्रहके अनुसार प्रस्तुत अर्थ किया गया है और यही युक्तियुक्त मालूम होता है।