॥ श्रीहरिः ॥
छन्दांस्यधीयीत गुरोराहूतश्चेत् सुयन्त्रितः।
उपक्रमेऽवसाने च चरणौ शिरसा नमेत्॥ ३
chandāṃsyadhīyīta gurorāhūtaścet suyantritaḥ|
upakrame'vasāne ca caraṇau śirasā namet|| 3
अर्थ
गुरुजी जब बुलावें तभी पूर्णतया अनुशासनमें रहकर उनसे वेदोंका स्वाध्याय करे। पाठके प्रारम्भ और अन्तमें उनके चरणोंमें सिर टेककर प्रणाम करे॥ ३॥
छन्दांस्यधीयीत गुरोराहूतश्चेत् सुयन्त्रितः।
उपक्रमेऽवसाने च चरणौ शिरसा नमेत्॥ ३
गुरुजी जब बुलावें तभी पूर्णतया अनुशासनमें रहकर उनसे वेदोंका स्वाध्याय करे। पाठके प्रारम्भ और अन्तमें उनके चरणोंमें सिर टेककर प्रणाम करे॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.12.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 879) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/12/3/