उनके कर्म, आकार, वाणी और वर्ण-आश्रम आदिके चिह्नोंसे लोग यह नहीं समझ सकते थे कि वे कोई सिद्ध पुरुष हैं या नहीं॥ १४॥
कर्मणाऽऽकृतिभिर्वाचा लिङ्गैर्वर्णाश्रमादिभिः।
न विदन्ति जना यं वै सोऽसाविति न वेति च॥ १४
उनके कर्म, आकार, वाणी और वर्ण-आश्रम आदिके चिह्नोंसे लोग यह नहीं समझ सकते थे कि वे कोई सिद्ध पुरुष हैं या नहीं॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.13.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 885) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/13/14/