तुम्हारी अनन्य भक्तिके कारण देवाधिदेव भगवान् नारायण सदा तुम्हारे हृदयमें विराजमान रहते हैं और जैसे सूर्य अन्धकारको नष्ट कर देते हैं, वैसे ही वे तुम्हारे अज्ञानको नष्ट करते रहते हैं॥ २१॥
यस्य नारायणो देवो भगवान्हृद्गतः सदा।
भक्त्या केवलयाज्ञानं धुनोति ध्वान्तमर्कवत्॥ २१
तुम्हारी अनन्य भक्तिके कारण देवाधिदेव भगवान् नारायण सदा तुम्हारे हृदयमें विराजमान रहते हैं और जैसे सूर्य अन्धकारको नष्ट कर देते हैं, वैसे ही वे तुम्हारे अज्ञानको नष्ट करते रहते हैं॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.13.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 885) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/13/21/