श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.13.23

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

तृष्णया भववाहिन्या योग्यैः कामैरपूरया।

कर्माणि कार्यमाणोऽहं नानायोनिषु योजितः॥ २३

tṛṣṇayā bhavavāhinyā yogyaiḥ kāmairapūrayā|

karmāṇi kāryamāṇo'haṃ nānāyoniṣu yojitaḥ|| 23

अर्थ

प्रह्लादजी! तृष्णा एक ऐसी वस्तु है, जो इच्छानुसार भोगोंके प्राप्त होनेपर भी पूरी नहीं होती। उसीके कारण जन्म-मृत्युके चक्करमें भटकना पड़ता है। तृष्णाने मुझसे न जाने कितने कर्म करवाये और उनके कारण न जाने कितनी योनियोंमें मुझे डाला॥ २३॥

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