श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.13.25

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

अत्रापि दम्पतीनां च सुखायान्यापनुत्तये।

कर्माणि कुर्वतां दृष्ट्वा निवृत्तोऽस्मि विपर्ययम्॥ २५

atrāpi dampatīnāṃ ca sukhāyānyāpanuttaye|

karmāṇi kurvatāṃ dṛṣṭvā nivṛtto'smi viparyayam|| 25

अर्थ

परन्तु मैं देखता हूँ कि संसारके स्त्री-पुरुष कर्म तो करते हैं सुखकी प्राप्ति और दुःखकी निवृत्तिके लिये, किन्तु उसका फल उलटा होता ही है—वे और भी दुःखमें पड़ जाते हैं। इसीलिये मैं कर्मोंसे उपरत हो गया हूँ॥ २५॥

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