श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.13.26

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

सुखमस्यात्मनो रूपं सर्वेहोपरतिस्तनुः।

मनःसस्पर्शजान् दृष्ट्वा भोगान्स्वप्स्यामि संविशन्॥ २६

sukhamasyātmano rūpaṃ sarvehoparatistanuḥ|

manaḥsasparśajān dṛṣṭvā bhogānsvapsyāmi saṃviśan|| 26

अर्थ

सुख ही आत्माका स्वरूप है। समस्त चेष्टाओंकी निवृत्ति ही उसका शरीर—उसके प्रकाशित होनेका स्थान है। इसलिये समस्त भोगोंको मनोराज्यमात्र समझकर मैं अपने प्रारब्धको भोगता हुआ पड़ा रहता हूँ॥ २६॥

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