सुख ही आत्माका स्वरूप है। समस्त चेष्टाओंकी निवृत्ति ही उसका शरीर—उसके प्रकाशित होनेका स्थान है। इसलिये समस्त भोगोंको मनोराज्यमात्र समझकर मैं अपने प्रारब्धको भोगता हुआ पड़ा रहता हूँ॥ २६॥
सुखमस्यात्मनो रूपं सर्वेहोपरतिस्तनुः।
मनःसस्पर्शजान् दृष्ट्वा भोगान्स्वप्स्यामि संविशन्॥ २६
सुख ही आत्माका स्वरूप है। समस्त चेष्टाओंकी निवृत्ति ही उसका शरीर—उसके प्रकाशित होनेका स्थान है। इसलिये समस्त भोगोंको मनोराज्यमात्र समझकर मैं अपने प्रारब्धको भोगता हुआ पड़ा रहता हूँ॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.13.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 886) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/13/26/