नारदजी कहते हैं—महाराज! प्रह्लादजीने दत्तात्रेय मुनिसे परमहंसोंके इस धर्मका श्रवण करके उनकी पूजा की और फिर उनसे विदा लेकर बड़ी प्रसन्नतासे अपनी राजधानीके लिये प्रस्थान किया॥ ४६॥
धर्मं पारमहंस्यं वै मुनेः श्रुत्वासुरेश्वरः।
पूजयित्वा ततः प्रीत आमन्त्र्य प्रययौ गृहम्॥ ४६
नारदजी कहते हैं—महाराज! प्रह्लादजीने दत्तात्रेय मुनिसे परमहंसोंके इस धर्मका श्रवण करके उनकी पूजा की और फिर उनसे विदा लेकर बड़ी प्रसन्नतासे अपनी राजधानीके लिये प्रस्थान किया॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.13.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 888) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/13/46/