श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.1

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अथ चतुर्दशोऽध्यायः

गृहस्थसम्बन्धी सदाचार

युधिष्ठिर उवाच

गृहस्थ एतां पदवीं विधिना येन चाञ्जसा।

याति देवऋषे ब्रूहि मादृशो गृहमूढधीः॥ १

gṛhastha etāṃ padavīṃ vidhinā yena cāñjasā|

yāti devaṛṣe brūhi mādṛśo gṛhamūḍhadhīḥ|| 1

अर्थ

राजा युधिष्ठिरने पूछा—देवर्षि नारदजी! मेरे जैसा गृहासक्त गृहस्थ बिना विशेष परिश्रमके इस पदको किस साधनसे प्राप्त कर सकता है, आप कृपा करके मुझे बतलाइये॥ १॥

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