श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.11

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

आश्वाघान्तेऽवसायिभ्यः कामान्संविभजेद् यथा।

अप्येकामात्मनो दारां नृणां स्वत्वग्रहो यतः॥ ११

āśvāghānte'vasāyibhyaḥ kāmānsaṃvibhajed yathā|

apyekāmātmano dārāṃ nṛṇāṃ svatvagraho yataḥ|| 11

अर्थ

अपनी समस्त भोग-सामग्रियोंको कुत्ते, पतित और चाण्डालपर्यन्त सब प्राणियोंको यथायोग्य बाँटकर ही अपने काममें लाना चाहिये। और तो क्या, अपनी स्त्रीको भी—जिसे मनुष्य समझता है कि यह मेरी है—अतिथि आदिकी निर्दोष सेवामें नियुक्त रखे॥ ११॥✎ 637

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #637 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् पर → भगवान्‌पर

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