श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.12

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

जह्याद् यदर्थे स्वप्राणान्हन्याद् वा पितरं गुरुम्।

तस्यां स्वत्वं स्त्रियां जह्याद् यस्तेन ह्यजितो जितः॥ १२

jahyād yadarthe svaprāṇānhanyād vā pitaraṃ gurum|

tasyāṃ svatvaṃ striyāṃ jahyād yastena hyajito jitaḥ|| 12

अर्थ

लोग स्त्रीके लिये अपने प्राणतक दे डालते हैं। यहाँतक कि अपने मा-बाप और गुरुको भी मार डालते हैं। उस स्त्रीपरसे जिसने अपनी ममता हटा ली, उसने स्वयं नित्यविजयी भगवान्‌पर भी विजय प्राप्त कर ली॥ १२॥✎ 637

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #637 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् पर → भगवान्‌पर

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें