श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.13

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

कृमिविड्भस्मनिष्ठान्तं क्वेदं तुच्छं कलेवरम्।

क्‍व तदीयरतिर्भार्या क्‍वायमात्मा नभश्छदिः॥ १३

kṛmiviḍbhasmaniṣṭhāntaṃ kvedaṃ tucchaṃ kalevaram|

kva tadīyaratirbhāryā kvāyamātmā nabhaśchadiḥ|| 13

अर्थ

यह शरीर अन्तमें कीड़े, विष्ठा या राखकी ढेरी होकर रहेगा। कहाँ तो यह तुच्छ शरीर और इसके लिये जिसमें आसक्ति होती है वह स्त्री, और कहाँ अपनी महिमासे आकाशको भी ढक रखनेवाला अनन्त आत्मा!॥ १३॥✎ 637

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #637 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् पर → भगवान्‌पर

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