श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.14

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

सिद्धैर्यज्ञावशिष्टार्थैः कल्पयेद् वृत्तिमात्मनः।

शेषे स्वत्वं त्यजन्प्राज्ञः पदवीं महतामियात्॥ १४

siddhairyajñāvaśiṣṭārthaiḥ kalpayed vṛttimātmanaḥ|

śeṣe svatvaṃ tyajanprājñaḥ padavīṃ mahatāmiyāt|| 14

अर्थ

गृहस्थको चाहिये कि प्रारब्धसे प्राप्त और पंचयज्ञ आदिसे बचे हुए अन्‍नसे ही अपना जीवन-निर्वाह करे। जो बुद्धिमान् पुरुष इसके सिवा और किसी वस्तुमें स्वत्व नहीं रखते, उन्हें संतोंका पद प्राप्त होता है॥ १४॥✎ 637

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #637 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् पर → भगवान्‌पर

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