॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.14.15
देवानृषीन् नृभूतानि पितॄनात्मानमन्वहम्।✎ 1105
स्ववृत्त्यागतवित्तेन यजेत पुरुषं पृथक्॥ १५
devānṛṣīn nṛbhūtāni pitṝnātmānamanvaham|
svavṛttyāgatavittena yajeta puruṣaṃ pṛthak|| 15
अर्थ
अपनी वर्णाश्रमविहित वृत्तिके द्वारा प्राप्त सामग्रियोंसे प्रतिदिन देवता, ऋषि, मनुष्य, भूत और पितृगणका तथा अपने आत्माका पूजन करना चाहिये। यह एक ही परमेश्वरकी भिन्न-भिन्न रूपोंमें आराधना है॥ १५॥✎ 638