युधिष्ठिर! वैसे तो समस्त यज्ञोंके भोक्ता भगवान् ही हैं; परन्तु ब्राह्मणके मुखमें अर्पित किये हुए हविष्यान्नसे उनकी जैसी तृप्ति होती है, वैसी अग्निके मुखमें हवन करनेसे नहीं॥ १७॥✎ 638
न ह्यग्निमुखतोऽयं वै भगवान्सर्वयज्ञभुक्।
इज्येत हविषा राजन्यथा विप्रमुखे हुतैः॥ १७
युधिष्ठिर! वैसे तो समस्त यज्ञोंके भोक्ता भगवान् ही हैं; परन्तु ब्राह्मणके मुखमें अर्पित किये हुए हविष्यान्नसे उनकी जैसी तृप्ति होती है, वैसी अग्निके मुखमें हवन करनेसे नहीं॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.14.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 890) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/14/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)