श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.18

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तस्माद् ब्राह्मणदेवेषु मर्त्यादिषु यथार्हतः।

तैस्तैः कामैर्यजस्वैनं क्षेत्रज्ञं ब्राह्मणाननु॥ १८

tasmād brāhmaṇadeveṣu martyādiṣu yathārhataḥ|

taistaiḥ kāmairyajasvainaṃ kṣetrajñaṃ brāhmaṇānanu|| 18

अर्थ

इसलिये ब्राह्मण, देवता, मनुष्य आदि सभी प्राणियोंमें यथायोग्य, उनके उपयुक्त सामग्रियोंके द्वारा सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान भगवान्‌की पूजा करनी चाहिये। इनमें प्रधानता ब्राह्मणोंकी ही है॥ १८॥✎ 639

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #639 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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