जब कोई इन द्रव्यमय यज्ञोंसे यजन करना चाहता है, तब सभी प्राणी डर जाते हैं; वे सोचने लगते हैं कि यह अपने प्राणोंका पोषण करनेवाला निर्दयी मूर्ख मुझे अवश्य मार डालेगा॥ १०॥
द्रव्ययज्ञैर्यक्ष्यमाणं दृष्ट्वा भूतानि बिभ्यति।
एष माकरुणो हन्यादतज्ज्ञो ह्यसुतृब् ध्रुवम्॥ १०
जब कोई इन द्रव्यमय यज्ञोंसे यजन करना चाहता है, तब सभी प्राणी डर जाते हैं; वे सोचने लगते हैं कि यह अपने प्राणोंका पोषण करनेवाला निर्दयी मूर्ख मुझे अवश्य मार डालेगा॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.15.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 894) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/15/10/