श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.11

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तस्माद् दैवोपपन्‍नेन मुन्यन्‍नेनापि धर्मवित्।

सन्तुष्टोऽहरहः कुर्यान्‍नित्यनैमित्तिकीः क्रियाः॥ ११

tasmād daivopapannena munyannenāpi dharmavit|

santuṣṭo'harahaḥ kuryānnityanaimittikīḥ kriyāḥ|| 11

अर्थ

इसलिये धर्मज्ञ मनुष्यको यही उचित है कि प्रतिदिन प्रारब्धके द्वारा प्राप्त मुनिजनोचित हविष्यान्‍नसे ही अपने नित्य और नैमित्तिक कर्म करे तथा उसीसे सर्वदा सन्तुष्ट रहे॥ ११॥

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