जिन्होंने अपने शरीरको अनात्मा, मृत्युग्रस्त और विष्ठा, कृमि एवं राख समझ लिया था—वे ही मूढ़ फिर उसे आत्मा मानकर उसकी प्रशंसा करने लगते हैं॥ ३७॥
यैः स्वदेहः स्मृतो नात्मा मर्त्यो विट्कृमिभस्मसात्।
त एनमात्मसात्कृत्वा श्लाघयन्ति ह्यसत्तमाः॥ ३७
जिन्होंने अपने शरीरको अनात्मा, मृत्युग्रस्त और विष्ठा, कृमि एवं राख समझ लिया था—वे ही मूढ़ फिर उसे आत्मा मानकर उसकी प्रशंसा करने लगते हैं॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.15.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 898) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/15/37/