श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.38

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

गृहस्थस्य क्रियात्यागो व्रतत्यागो वटोरपि।

तपस्विनो ग्रामसेवा भिक्षोरिन्द्रियलोलता॥ ३८

gṛhasthasya kriyātyāgo vratatyāgo vaṭorapi|

tapasvino grāmasevā bhikṣorindriyalolatā|| 38

अर्थ

कर्मत्यागी गृहस्थ, व्रतत्यागी ब्रह्मचारी, गाँवमें रहनेवाला तपस्वी (वानप्रस्थ) और इन्द्रियलोलुप संन्यासी—ये चारों आश्रमके कलंक हैं और व्यर्थ ही आश्रमोंका ढोंग करते हैं। भगवान्‌की मायासे विमोहित उन मूढ़ोंपर तरस खाकर उनकी उपेक्षा कर देनी चाहिये॥ ३८-३९॥✎ 646

यह अर्थ श्लोक 38–39 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #646 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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