श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.4

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

देशकालोचितश्रद्धाद्रव्यपात्रार्हणानि च।

सम्यग् भवन्ति नैतानि १विस्तरात् स्वजनार्पणात्॥ ४

deśakālocitaśraddhādravyapātrārhaṇāni ca|

samyag bhavanti naitāni vistarāt svajanārpaṇāt|| 4

अर्थ

क्योंकि सगे-सम्बन्धी आदि स्वजनोंको देनेसे और विस्तार करनेसे देश-कालोचित श्रद्धा, पदार्थ, पात्र और पूजन आदि ठीक-ठीक नहीं हो पाते॥ ४॥✎ 645

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—भूतानि।

    (मुद्रित पृष्ठ 894)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #645 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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