क्योंकि सगे-सम्बन्धी आदि स्वजनोंको देनेसे और विस्तार करनेसे देश-कालोचित श्रद्धा, पदार्थ, पात्र और पूजन आदि ठीक-ठीक नहीं हो पाते॥ ४॥✎ 645
देशकालोचितश्रद्धाद्रव्यपात्रार्हणानि च।
सम्यग् भवन्ति नैतानि विस्तरात् स्वजनार्पणात्॥ ४
क्योंकि सगे-सम्बन्धी आदि स्वजनोंको देनेसे और विस्तार करनेसे देश-कालोचित श्रद्धा, पदार्थ, पात्र और पूजन आदि ठीक-ठीक नहीं हो पाते॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.15.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 894) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/15/4/