देश और कालके प्राप्त होनेपर ऋषि-मुनियोंके भोजन करनेयोग्य शुद्ध हविष्यान्न भगवान्को भोग लगाकर श्रद्धासे विधिपूर्वक योग्य पात्रको देना चाहिये। वह समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और अक्षय होता है॥ ५॥✎ 645
देशे काले च सम्प्राप्ते मुन्यन्नं हरिदैवतम्।
श्रद्धया विधिवत् पात्रे न्यस्तं कामधुगक्षयम्॥ ५
देश और कालके प्राप्त होनेपर ऋषि-मुनियोंके भोजन करनेयोग्य शुद्ध हविष्यान्न भगवान्को भोग लगाकर श्रद्धासे विधिपूर्वक योग्य पात्रको देना चाहिये। वह समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और अक्षय होता है॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.15.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 894) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/15/5/