आत्मज्ञानके द्वारा जिसकी सारी वासनाएँ निर्मूल हो गयी हैं और जिसने अपने आत्माको परब्रह्मस्वरूप जान लिया है, वह किस विषयकी इच्छा और किस भोक्ताकी तृप्तिके लिये इन्द्रियलोलुप होकर अपने शरीरका पोषण करेगा?॥ ४०॥
आत्मानं चेद् विजानीयात् परं ज्ञानधुताशयः।
किमिच्छन्कस्य वा हेतोर्देहं पुष्णाति लम्पटः॥ ४०
आत्मज्ञानके द्वारा जिसकी सारी वासनाएँ निर्मूल हो गयी हैं और जिसने अपने आत्माको परब्रह्मस्वरूप जान लिया है, वह किस विषयकी इच्छा और किस भोक्ताकी तृप्तिके लिये इन्द्रियलोलुप होकर अपने शरीरका पोषण करेगा?॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.15.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 898) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/15/40/