श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.41

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

आहुः शरीरं रथमिन्द्रियाणि

हयानभीषून् मन इन्द्रियेशम्।

वर्त्मानि मात्रा धिषणां च सूतं

सत्त्वं बृहद् बन्धुरमीशसृष्टम्॥ ४१

āhuḥ śarīraṃ rathamindriyāṇi

hayānabhīṣūn mana indriyeśam|

vartmāni mātrā dhiṣaṇāṃ ca sūtaṃ

sattvaṃ bṛhad bandhuramīśasṛṣṭam|| 41

अर्थ

उपनिषदोंमें कहा गया है कि शरीर रथ है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं, इन्द्रियोंका स्वामी मन लगाम है, शब्दादि विषय मार्ग हैं, बुद्धि सारथि है, चित्त ही भगवान्‌के द्वारा निर्मित बाँधनेकी विशाल रस्सी है, दस प्राण धुरी हैं, धर्म और अधर्म पहिये हैं और इनका अभिमानी जीव रथी कहा गया है। ॐ कार ही उस रथीका धनुष है, शुद्ध जीवात्मा बाण और परमात्मा लक्ष्य है। (इस ॐ कारके द्वारा अन्तरात्माको परमात्मामें लीन कर देना चाहिये)॥ ४१-४२॥

यह अर्थ श्लोक 41–42 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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