श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.42

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

अक्षं दशप्राणमधर्मधर्मौ

चक्रेऽभिमानं रथिनं च जीवम्।

धनुर्हि तस्य प्रणवं पठन्ति

शरं तु जीवं परमेव लक्ष्यम्॥ ४२

akṣaṃ daśaprāṇamadharmadharmau

cakre'bhimānaṃ rathinaṃ ca jīvam|

dhanurhi tasya praṇavaṃ paṭhanti

śaraṃ tu jīvaṃ parameva lakṣyam|| 42

अर्थ

उपनिषदोंमें कहा गया है कि शरीर रथ है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं, इन्द्रियोंका स्वामी मन लगाम है, शब्दादि विषय मार्ग हैं, बुद्धि सारथि है, चित्त ही भगवान्‌के द्वारा निर्मित बाँधनेकी विशाल रस्सी है, दस प्राण धुरी हैं, धर्म और अधर्म पहिये हैं और इनका अभिमानी जीव रथी कहा गया है। ॐ कार ही उस रथीका धनुष है, शुद्ध जीवात्मा बाण और परमात्मा लक्ष्य है। (इस ॐ कारके द्वारा अन्तरात्माको परमात्मामें लीन कर देना चाहिये)॥ ४१-४२॥

यह अर्थ श्लोक 41–42 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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