श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.43

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

रागो द्वेषश्‍च लोभश्‍च शोकमोहौ भयं मदः।

मानोऽवमानोऽसूया च माया हिंसा च मत्सरः॥ ४३

rāgo dveṣaśca lobhaśca śokamohau bhayaṃ madaḥ|

māno'vamāno'sūyā ca māyā hiṃsā ca matsaraḥ|| 43

अर्थ

राग, द्वेष, लोभ, शोक, मोह, भय, मद, मान, अपमान, दूसरेके गुणोंमें दोष निकालना, छल, हिंसा, दूसरेकी उन्‍नति देखकर जलना, तृष्णा, प्रमाद, भूख और नींद—ये सब, और ऐसे ही जीवोंके और भी बहुत-से शत्रु हैं। उनमें रजोगुण और तमोगुणप्रधान वृत्तियाँ अधिक हैं, कहीं-कहीं कोई-कोई सत्त्वगुणप्रधान ही होती हैं॥ ४३-४४॥

यह अर्थ श्लोक 43–44 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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