श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.50

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

द्रव्यसूक्ष्मविपाकश्‍च धूमो रात्रिरपक्षयः।

अयनं दक्षिणं सोमो दर्श ओषधिवीरुधः॥ ५०

dravyasūkṣmavipākaśca dhūmo rātrirapakṣayaḥ|

ayanaṃ dakṣiṇaṃ somo darśa oṣadhivīrudhaḥ|| 50

अर्थ

प्रवृत्तिपरायण पुरुष मरनेपर चरु-पुरोडाशादि यज्ञसम्बन्धी द्रव्योंके सूक्ष्मभागसे बना हुआ शरीर धारणकर धूमाभिमानी देवताओंके पास जाता है। फिर क्रमशः रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायनके अभिमानी देवताओंके पास जाकर चन्द्रलोकमें पहुँचता है। वहाँसे भोग समाप्त होनेपर अमावस्याके चन्द्रमाके समान क्षीण होकर वृष्टिद्वारा क्रमशः ओषधि, लता, अन्‍न और वीर्यके रूपमें परिणत होकर पितृयान-मार्गसे पुनः संसारमें ही जन्म लेता है॥ ५०-५१॥✎ 1618 1619

यह अर्थ श्लोक 50–51 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1618 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: यज्ञ-सम्बन्धी → यज्ञसम्बन्धी
  • #1619 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रवृत्ति-परक → प्रवृत्तिपरक

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