॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.15.51
अन्नं रेत इति क्ष्मेश पितृयानं पुनर्भवः।
एकैकश्येनानुपूर्वं भूत्वा भूत्वेह जायते॥ ५१
annaṃ reta iti kṣmeśa pitṛyānaṃ punarbhavaḥ|
ekaikaśyenānupūrvaṃ bhūtvā bhūtveha jāyate|| 51
अर्थ
प्रवृत्तिपरायण पुरुष मरनेपर चरु-पुरोडाशादि यज्ञसम्बन्धी द्रव्योंके सूक्ष्मभागसे बना हुआ शरीर धारणकर धूमाभिमानी देवताओंके पास जाता है। फिर क्रमशः रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायनके अभिमानी देवताओंके पास जाकर चन्द्रलोकमें पहुँचता है। वहाँसे भोग समाप्त होनेपर अमावस्याके चन्द्रमाके समान क्षीण होकर वृष्टिद्वारा क्रमशः ओषधि, लता, अन्न और वीर्यके रूपमें परिणत होकर पितृयान-मार्गसे पुनः संसारमें ही जन्म लेता है॥ ५०-५१॥✎ 1618 1619