श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.72

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

अहं च गायंस्तद्विद्वान् स्त्रीभिः परिवृतो गतः।

ज्ञात्वा विश्‍वसृजस्तन्मे हेलनं शेपुरोजसा।

याहि त्वं शूद्रतामाशु नष्टश्रीः कृतहेलनः॥ ७२

ahaṃ ca gāyaṃstadvidvān strībhiḥ parivṛto gataḥ|

jñātvā viśvasṛjastanme helanaṃ śepurojasā|

yāhi tvaṃ śūdratāmāśu naṣṭaśrīḥ kṛtahelanaḥ|| 72

अर्थ

मैं जानता था कि वह संतोंका समाज है और वहाँ भगवान्‌की लीलाका ही गान होता है। फिर भी मैं स्त्रियोंके साथ लौकिक गीतोंका गान करता हुआ उन्मत्तकी तरह वहाँ जा पहुँचा। देवताओंने देखा कि यह तो हम लोगोंका अनादर कर रहा है। उन्होंने अपनी शक्तिसे मुझे शाप दे दिया कि ‘तुमने हमलोगोंकी अवहेलना की है, इसलिये तुम्हारी सारी सौन्दर्य-सम्पत्ति नष्ट हो जाय और तुम शीघ्र ही शूद्र हो जाओ’॥ ७२॥✎ 647 648

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #647 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #648 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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