श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.23

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

यथाम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव।

चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते चलतीव भूः॥ २३

yathāmbhasā pracalatā taravo'pi calā iva|

cakṣuṣā bhrāmyamāṇena dṛśyate calatīva bhūḥ|| 23

अर्थ

जैसे हिलते हुए पानीके साथ उसमें प्रतिबिम्बित होनेवाले वृक्ष भी हिलते-से जान पड़ते हैं और घुमायी जाती हुई आँखके साथ सारी पृथ्वी ही घूमती-सी दिखायी देती है, कल्याणी! वैसे ही विषयोंके कारण मन भटकने लगता है और वास्तवमें निर्विकार होनेपर भी उसीके समान आत्मा भी भटकता हुआ-सा जान पड़ता है। उसका स्थूल और सूक्ष्म- शरीरोंसे कोई भी सम्बन्ध नहीं है, फिर भी वह सम्बन्धी-सा जान पड़ता है॥ २३-२४॥

यह अर्थ श्लोक 23–24 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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