॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.2.24
एवं गुणैर्भ्राम्यमाणे मनस्यविकलः पुमान्।
याति तत्साम्यतां भद्रे ह्यलिङ्गो लिङ्गवानिव॥ २४
evaṃ guṇairbhrāmyamāṇe manasyavikalaḥ pumān|
yāti tatsāmyatāṃ bhadre hyaliṅgo liṅgavāniva|| 24
अर्थ
जैसे हिलते हुए पानीके साथ उसमें प्रतिबिम्बित होनेवाले वृक्ष भी हिलते-से जान पड़ते हैं और घुमायी जाती हुई आँखके साथ सारी पृथ्वी ही घूमती-सी दिखायी देती है, कल्याणी! वैसे ही विषयोंके कारण मन भटकने लगता है और वास्तवमें निर्विकार होनेपर भी उसीके समान आत्मा भी भटकता हुआ-सा जान पड़ता है। उसका स्थूल और सूक्ष्म- शरीरोंसे कोई भी सम्बन्ध नहीं है, फिर भी वह सम्बन्धी-सा जान पड़ता है॥ २३-२४॥