श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.25

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

एष आत्मविपर्यासो ह्यलिङ्गे लिङ्गभावना।

एष प्रियाप्रियैर्योगो वियोगः कर्मसंसृतिः॥ २५

eṣa ātmaviparyāso hyaliṅge liṅgabhāvanā|

eṣa priyāpriyairyogo viyogaḥ karmasaṃsṛtiḥ|| 25

अर्थ

सब प्रकारसे शरीररहित आत्माको शरीर समझ लेना—यही तो अज्ञान है। इसीसे प्रिय अथवा अप्रिय वस्तुओंका मिलना और बिछुड़ना होता है। इसीसे कर्मोंके साथ सम्बन्ध हो जानेके कारण संसारमें भटकना पड़ता है॥ २५॥

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