॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.2.43
यथानलो दारुषु भिन्न ईयते
यथानिलो देहगतः पृथक् स्थितः।
यथा नभः सर्वगतं न सज्जते
तथा पुमान् सर्वगुणाश्रयः परः॥ ४३
yathānalo dāruṣu bhinna īyate
yathānilo dehagataḥ pṛthak sthitaḥ|
yathā nabhaḥ sarvagataṃ na sajjate
tathā pumān sarvaguṇāśrayaḥ paraḥ|| 43
अर्थ
जैसे काठमें रहनेवाली व्यापक अग्नि स्पष्ट ही उससे अलग है, जैसे देहमें रहनेपर भी वायुका उससे कोई सम्बन्ध नहीं है, जैसे आकाश सब जगह एक-सा रहनेपर भी किसीके दोष-गुणसे लिप्त नहीं होता—वैसे ही समस्त देहेन्द्रियोंमें रहनेवाला और उनका आश्रय आत्मा भी उनसे अलग और निर्लिप्त है॥ ४३॥