श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.44

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

सुयज्ञो नन्वयं शेते मूढा यमनुशोचथ।

यः श्रोता योऽनुवक्तेह स न दृश्येत कर्हिचित्॥ ४४

suyajño nanvayaṃ śete mūḍhā yamanuśocatha|

yaḥ śrotā yo'nuvakteha sa na dṛśyeta karhicit|| 44

अर्थ

मूर्खो! जिसके लिये तुम सब शोक कर रहे हो, वह सुयज्ञ नामका शरीर तो तुम्हारे सामने पड़ा है। तुमलोग इसीको देखते थे। इसमें जो सुननेवाला और बोलनेवाला था, वह तो कभी किसीको नहीं दिखायी पड़ता था। फिर आज भी नहीं दिखायी दे रहा है, तो शोक क्यों?॥ ४४॥✎ 1860

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1860 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): ४ ७॥ → ४७॥

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