श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.47

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

यावल्लिङ्गान्वितो ह्यात्मा तावत् कर्म निबन्धनम्।

ततो विपर्ययः क्लेशो मायायोगोऽनुवर्तते॥ ४७

yāvalliṅgānvito hyātmā tāvat karma nibandhanam|

tato viparyayaḥ kleśo māyāyogo'nuvartate|| 47

अर्थ

जबतक वह पाँच प्राण, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, बुद्धि और मन—इन सत्रह तत्त्वोंसे बने हुए लिंगशरीरसे युक्त रहता है, तभीतक कर्मोंसे बँधा रहता है और इस बन्धनके कारण ही मायासे होनेवाले मोह और क्लेश बराबर उसके पीछे पड़े रहते हैं॥ ४७॥✎ 1860

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1860 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): ४ ७॥ → ४७॥

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