vitatya jālaṃ vidadhe tatra tatra pralobhayan|| 50
अर्थ
किसी जंगलमें एक बहेलिया रहता था। वह बहेलिया क्या था, विधाताने मानो उसे पक्षियोंके कालरूपमें ही रच रखा था। जहाँ-कहीं भी वह जाल फैला देता और ललचाकर चिड़ियोंको फँसा लेता॥ ५०॥✎ 2020
लुब्धको विपिने कश्चित्पक्षिणां निर्मितोऽन्तकः।
वितत्य जालं विदधे तत्र तत्र प्रलोभयन्॥ ५०
किसी जंगलमें एक बहेलिया रहता था। वह बहेलिया क्या था, विधाताने मानो उसे पक्षियोंके कालरूपमें ही रच रखा था। जहाँ-कहीं भी वह जाल फैला देता और ललचाकर चिड़ियोंको फँसा लेता॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.2.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 817) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/2/50/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)