श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.51

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

कुलिङ्गमिथुनं तत्र विचरत्समदृश्यत।

तयोः कुलिङ्गी सहसा लुब्धकेन प्रलोभिता॥ ५१

kuliṅgamithunaṃ tatra vicaratsamadṛśyata|

tayoḥ kuliṅgī sahasā lubdhakena pralobhitā|| 51

अर्थ

एक दिन उसने कुलिंग पक्षीके एक जोड़ेको चारा चुगते देखा। उनमेंसे उस बहेलियेने मादा पक्षीको तो शीघ्र ही फँसा लिया॥ ५१॥✎ 2020

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2020 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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