इसलिये तुमलोग भी अपने लिये या किसी दूसरेके लिये शोक मत करो। इस संसारमें कौन अपना है और कौन अपनेसे भिन्न? क्या अपना है और क्या पराया? प्राणियोंको अज्ञानके कारण ही यह अपने-परायेका दुराग्रह हो रहा है, इस भेद-बुद्धिका और कोई कारण नहीं है॥ ६०॥
ततः शोचत मा यूयं परं चात्मानमेव च।
क आत्मा कः परो वात्र स्वीयः पारक्य एव वा।
स्वपराभिनिवेशेन विनाज्ञानेन देहिनाम्॥ ६०
इसलिये तुमलोग भी अपने लिये या किसी दूसरेके लिये शोक मत करो। इस संसारमें कौन अपना है और कौन अपनेसे भिन्न? क्या अपना है और क्या पराया? प्राणियोंको अज्ञानके कारण ही यह अपने-परायेका दुराग्रह हो रहा है, इस भेद-बुद्धिका और कोई कारण नहीं है॥ ६०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.2.60 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 818) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/2/60/