श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.61

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

नारद उवाच

इति दैत्यपतेर्वाक्यं दितिराकर्ण्य सस्नुषा।

पुत्रशोकं क्षणात्त्यक्‍त्वा तत्त्वे चित्तमधारयत्॥ ६१

iti daityapatervākyaṃ ditirākarṇya sasnuṣā|

putraśokaṃ kṣaṇāttyaktvā tattve cittamadhārayat|| 61

अर्थ

नारदजीने कहा—युधिष्ठिर! अपनी पुत्रवधूके साथ दितिने हिरण्यकशिपुकी यह बात सुनकर उसी क्षण पुत्रशोकका त्याग कर दिया और अपना चित्त परमतत्त्वस्वरूप परमात्मामें लगा दिया॥ ६१॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे
दितिशोकापनयनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥

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