हिरण्यकशिपुके अत्याचार और प्रह्लादके गुणोंका वर्णन
नारद उवाच
एवं वृतः शतधृतिर्हिरण्यकशिपोरथ।
प्रादात्तत्तपसा प्रीतो वरांस्तस्य सुदुर्लभान्॥ १
evaṃ vṛtaḥ śatadhṛtirhiraṇyakaśiporatha|
prādāttattapasā prīto varāṃstasya sudurlabhān|| 1
अर्थ
नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! जब हिरण्यकशिपुने ब्रह्माजीसे इस प्रकारके अत्यन्त दुर्लभ वर माँगे, तब उन्होंने उसकी तपस्यासे प्रसन्न होनेके कारण उसे वे वर दे दिये॥ १॥
एवं वृतः शतधृतिर्हिरण्यकशिपोरथ।
प्रादात्तत्तपसा प्रीतो वरांस्तस्य सुदुर्लभान्॥ १
नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! जब हिरण्यकशिपुने ब्रह्माजीसे इस प्रकारके अत्यन्त दुर्लभ वर माँगे, तब उन्होंने उसकी तपस्यासे प्रसन्न होनेके कारण उसे वे वर दे दिये॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.4.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 823) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/4/1/