श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.10

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यत्र चित्रवितानानि पद्मरागासनानि च।

पयःफेननिभाः शय्या मुक्तादामपरिच्छदाः॥ १०

yatra citravitānāni padmarāgāsanāni ca|

payaḥphenanibhāḥ śayyā muktādāmaparicchadāḥ|| 10

अर्थ

उस महलमें मूँगेकी सीढ़ियाँ, पन्‍नेकी गचें, स्फटिकमणिकी दीवारें, वैदूर्यमणिके खंभे और माणिककी कुर्सियाँ थीं। रंग-बिरंगे चँदोवे तथा दूधके फेनके समान शय्याएँ, जिनपर मोतियोंकी झालरें लगी हुई थीं, शोभायमान हो रही थीं॥ ९-१०॥✎ 581 2021

यह अर्थ श्लोक 9–10 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #581 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #2021 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि

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