श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.11

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

कूजद्भिर्नूपुरैर्देव्यः शब्दयन्त्य इतस्ततः।

रत्नस्थलीषु पश्यन्ति सुदतीः सुन्दरं मुखम्॥ ११

kūjadbhirnūpurairdevyaḥ śabdayantya itastataḥ|

ratnasthalīṣu paśyanti sudatīḥ sundaraṃ mukham|| 11

अर्थ

सर्वांगसुन्दरी अप्सराएँ अपने नूपुरोंसे रुन-झुन ध्वनि करती हुई रत्नमय भूमिपर इधर-उधर टहला करती थीं और कहीं-कहीं उसमें अपना सुन्दर मुख देखने लगती थीं॥ ११॥

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