श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.18

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

शैला द्रोणीभिराक्रीडं सर्वर्तुषु गुणान् द्रुमाः।

दधार लोकपालानामेक एव पृथग्गुणान्॥ १८

śailā droṇībhirākrīḍaṃ sarvartuṣu guṇān drumāḥ|

dadhāra lokapālānāmeka eva pṛthagguṇān|| 18

अर्थ

पर्वत अपनी घाटियोंके रूपमें उसके लिये खेलनेका स्थान जुटाते और वृक्ष सब ऋतुओंमें फूलते-फलते। वह अकेला ही सब लोकपालोंके विभिन्‍न गुणोंको धारण करता॥ १८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें