इस प्रकार दिग्विजयी और एकच्छत्र सम्राट् होकर वह अपनेको प्रिय लगनेवाले विषयोंका स्वच्छन्द उपभोग करने लगा। परन्तु इतने विषयोंसे भी उसकी तृप्ति न हो सकी। क्योंकि अन्ततः वह इन्द्रियोंका दास ही तो था॥ १९॥
स इत्थं निर्जितककुबेकराड् विषयान् प्रियान्।
यथोपजोषं भुञ्जानो नातृप्यदजितेन्द्रियः॥ १९
इस प्रकार दिग्विजयी और एकच्छत्र सम्राट् होकर वह अपनेको प्रिय लगनेवाले विषयोंका स्वच्छन्द उपभोग करने लगा। परन्तु इतने विषयोंसे भी उसकी तृप्ति न हो सकी। क्योंकि अन्ततः वह इन्द्रियोंका दास ही तो था॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.4.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 825) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/4/19/