yadgatvā na nivartante śāntāḥ saṃnyāsino'malāḥ|| 22
अर्थ
(उन्होंने मन-ही-मन कहा—) ‘जहाँ सर्वात्मा जगदीश्वर श्रीहरि निवास करते हैं और जिसे प्राप्त करके शान्त एवं निर्मल संन्यासी महात्मा फिर लौटते नहीं, भगवान्के उस परम धामको हम नमस्कार करते हैं’॥ २२॥✎ 582583
तस्यै नमोऽस्तु काष्ठायै यत्रात्मा हरिरीश्वरः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते शान्ताः संन्यासिनोऽमलाः॥ २२
(उन्होंने मन-ही-मन कहा—) ‘जहाँ सर्वात्मा जगदीश्वर श्रीहरि निवास करते हैं और जिसे प्राप्त करके शान्त एवं निर्मल संन्यासी महात्मा फिर लौटते नहीं, भगवान्के उस परम धामको हम नमस्कार करते हैं’॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.4.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 825) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/4/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)