श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.31

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

ब्रह्मण्यः शीलसम्पन्‍नः सत्यसन्धो जितेन्द्रियः।

आत्मवत्सर्वभूतानामेकः प्रियसुहृत्तमः॥ ३१

brahmaṇyaḥ śīlasampannaḥ satyasandho jitendriyaḥ|

ātmavatsarvabhūtānāmekaḥ priyasuhṛttamaḥ|| 31

अर्थ

ब्राह्मणभक्त, सौम्यस्वभाव, सत्यप्रतिज्ञ एवं जितेन्द्रिय थे तथा समस्त प्राणियोंके साथ अपने ही समान समताका बर्ताव करते और सबके एकमात्र प्रिय और सच्चे हितैषी थे॥ ३१॥

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